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लाडनूं : एक इतिहासिक परिचय
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ईशा पूर्व से विक्रम सवंत् 1000 तक
       
        5000 - रामायण काल में यह प्रदेश समुद्र तटीय आभीर द्वीप के नाम से जाना जाता था। श्रीराम के अनायास धनुष पर प्रत्यंच्चा चढा लेने एंव अग्नि बाण इसी दिशा में छोडने से यह प्रदेश मरूभूमि में परिवर्तित हो गया।
       
        3000 - महाभारत में इस प्रदेश का उल्लेख ‘गन्धर्व वन’ नाम से मिलता है। ऋड्ढि भाद्वाज का आचार्यवास ( सम्भवतः चाडवास) यहीं पहाड के समीप स्थित था। ऋड्ढि की साधना स्घ्थली आठ चोटियों वाली पहाडी का उल्लेख ‘‘ काला डूंगर ’’ नाम से हुआ है। ऋड्ढि भारद्वाज के पुत्र द्रोणाचार्य पांडवों के गुरू थे। द्रारेणाचार्य को गन्धर्व वन का 1440 गॉंवों वाला भू-भाग गुरू दक्षिणा में प्राप्त हुआ। डूंगर के पार्ष्व में स्थित गुफा गुरू द्रोण के सुपुत्र के नाम पर ‘‘अष्वत्थामा गुफा’’ कहलाती है। कहते हैं, यह गुफा अन्दर ही अन्दर किसी गढ तक जाती है। महाभारत युद्व के बाद इस प्रदेश पर पांडु पुत्र नुकुल एंव सीदेव का शासन रहा।
       
        - कालांतर में यह प्रदेश कृष्ण के समकालीन शिशुपाल वंशीय परंपरा के ही पॅंवार डहेलिया राजपूतों के हाथलगा। डहेलिया चन्देल थे। चन्देन महाराजा ने इस स्थान पर सामरिक महत्व के एक किले, चन्द्र महल एंव चन्द्रा बावडी का निर्माण कराया। तभी से यह स्थान ‘चन्देली’ के नाम से मशहूर हुआ जो समय पाकर ‘चन्देरी’ कहलाने लगा। दंत कथाओं में इसे ‘बूढी चन्देरी’ के नाम से जाना जाता है।
       
        179- 170 - मौर्य सम्राट अशोक के सामा्ज्य काल में लॉडनू स्थित किले के समीप एक बौद्ध मठ का निर्माण हुआ। वर्तमान में सिंघीजी के फलसे के आस-पास इसके अवशेड्ढ डटे पडे हैं। कुछ अवशेड्ढ गढ की दीवारों के यत्र-तत्र चुने हुए देखे जा सकते हें।
       
        232 - सम्राट अशोक के प्रपौत्र सम्राट सम्प्रति ने यहॉं एक विशाल जैन मंदिर का निर्माण करवाया। सम्प्रति का राज्याभिड्ढेक वि. स. से 232 पूर्व माना जाता है। इस मंिदर के भग्नावेश वर्तमान दिगम्बर जैन वृहद मंदिर के गर्भ गृह में सुरक्षित हैं।
       
        विक्रम संवत
        122-130 - सिंघ के शाहजादों द्वारा ‘चन्देरी’ पर हमला किया गया। इस युद्व में चन्देल नरेश वीरपाल मारे गये। चन्देरी पर सिंध ध्वज लहरा उठा। आठ साल बाद चन्देलों के संगठित उपक्रम से पुनः चन्देरी पर चन्देलों ने विजय प्राप्त कर ली।
       
        174 - गढ के होद पर स्थित मासताजी की देवली पर संवत 174 का कीर्ति लेख खुदा था।
                - चन्देल राजा महिपति पाल के शासन के समय ‘महिपतिपुर’ के नाम से विख्यात हुआ।
                - नागौर के ‘बागडी’ राजपूतों ने महिपतिपुर पर हमला किया। युद्व में 600 डहेलिया जवान खेत रहे एंव महिपमिपुर बगडि.यों के कब्जे में चला गया।
       
        505 - वृहद जैन मंदिर के तीर्थकर पंच कल्याणक समारोह हुआ जिसमें श्रेष्ठि कोल्हाणसी काला निर्मापित बिंब का प्रतिस्थापन आचार्य भानुनन्दि द्वारा सम्पन्न हुआ।
       
        549 - वृहद जैन मंदिर में साह लालजी द्वारा निर्मापित बिंब का प्रतिष्ठा समारोह हुआ।
       
        600 - साह लाडप ने 24 करोड द्रव्य खर्च कर वृहद जैन मंदिर में आचार्य भानुचन्द्र के कर- कमलों से बिंब प्रतिष्ठा करवाई।
       
        606 - साह भारीज पापडीवाल ने आचार्य मेघचन्द्र के हाथेां वृहद जैन मंदिर में बिंब प्रतिष्ठा करवाई।
       
        616 - वृहद जैन मंदिर में साह भारीज द्वारा एक और बिंब प्रतिष्ठापित हुआ।
                (उक्त सभी बिंब प्रतिष्ठाओं का उल्लेख डा. कस्तूरचंद कासलीवाल ने अपने ग्रन्थ ‘‘खण्डेलवाल जैन समाज का वृहद इतिहास’’ - 1989 में किया है)
       
        631 - चौहान राणा मोहिल ने फौज एकत्रित कर वणिक बोहरा सन्तन की मदद से महिपतिपुर (लॉडनू) पर आक्रमण किया। बागडी मैदान छोडकर भाग छूटे। द्रोणपुर के 1440 गॉंव वाले भू-भाग पर मोहिलों का कब्जा सवंत् 1532 तक कायम रहा।
       
        689 - वृदि जैन मंदिर में साह जयकुमार द्वारा निर्मापित बिंब की प्रतिष्ठा भट्टारक देवसेन के हाथों सम्पन्न हुई।
       
        717 - श्रेष्ठि सोढा छाबडा निर्मापित बिम्ब भट्टारक विष्धु नन्दि के कर कमलों से वृहद जैन मंदिर में प्रतिस्थापित हुआ।
       
        796 - साह राजू बाजू राउकां (रांका) निर्मापित बिम्ब भट्टाराक धर्मचन्द्र द्वारा वृहद जैन मंदिर में पतिष्ठित हुआ।
       
        880  - साह लोहर लोहाडिया निर्मापित बिम्ब आचार्य अभयचन्द्र द्वारा वृहद जैन मंदिर में प्रतिस्थापित हुआ।
       
        885 - साह गोधू गोधा एंव वीरचन्द्र पहाडिया निर्मापित बिम्ब की प्रतिष्ठा भट्टारक नरचन्द्र ने वृहद जैन मंदिर में सम्पन्न की।
       
        909  - साह वाणारस पास पांडया निर्मापित बिम्ब भट्टारक नरचन्द्र द्वारा वृहद जैन मंदिर में प्रतिस्थापित हुआ।
       
        952 - साह तेहमल द्वारा निर्मापित बिम्ब की प्रतिष्ठा वृहद जैन मंदिर में आचार्य गुणचन्द्र द्वारा सम्पन्न हुई। (उक्त सभी बिंब प्रतिष्ठाओं का उल्लेख डा. कस्तूरचंद कासलीवाल ने अपने ग्रन्थ (खण्डेलवाल जैन समाज का वृहद इतिहास) - 1989 में किया है)
                - मोहिल राणा सहणपाल के समय ठाकुर मनसुख ने गढ की दीवारें जो तब तक कच्ची थी, पक्की बनवाई। भैरव बुजै के निर्माण में जब कठिनाई आई तो पारीख ब्राम्हण पंडित लाडोजी की सहायता ली गई। पंछितजी के वंशजों का ‘‘पारीखों का बास’’ कहलाता है। एक अन्य अनुश्रुति के अनुसार पंडितजी की लडकी ‘‘लाडा’’ की बुजै की सुरक्षा हेतु बलि दी गई। अस्तु गढ का नामकरण ‘‘लॉडनू’’ प्रचलित हुआ।
       
विक्रम संवत् 1000 से 1800 तक
       
        1010 - लाडनू के किले की दीवार में चुने वार पंक्तियों में प्रस्तर स्मारक के लेखानुसार ‘‘पदमज दुहित्रक सुव’’ उत्कीर्णित होने से किसी समय गढ पर नागवंशीय क्षत्रियों का शासन होना संभव है।
       
        1052 - वृहद दिगम्बर जैन मंदिर में मनहर अजमेरा निर्मापित बिम्ब भट्टारक गुणचन्द्र द्वारा प्रतिष्ठित हुआ। साह सोनपाल सोढन निर्मापित बिम्ब भी मंदिर में प्रतिष्ठित हुआ।
       
        1101 - साह किलोजी बेनाड.k निर्मापित बिम्ब बडे जैन मंदिर में प्रतिस्थापित हुआ।
       
        1110  - साह पोहलण बेनाड.k निर्मापित बिम्ब भट्टारक भावचन्द द्वारा वृहद जैन मंदिर  में प्रतिस्थापित हुआ।
       
        1129 - साह टोडरमल द्वारा भाई दौलतजी गोठी निर्मापित बिम्ब की प्रतिष्ठा वृहद जैन मंदिर में की गई।
       
        1132 - साह भरतराम करहल निर्मापित बिम्ब की प्रतिष्ठा वृहद जैन मंदिर में की गई।
        (उक्त सभी बिंब प्रतिष्ठाओं का उल्लेख डा. कस्तूरचंद कासलीवाल ने अपने ग्रन्थ ‘‘खण्डेलवाल जैन समाज का वृहद इतिहास’’ - 1989 में किया है)
       
        1136 - वृहद जैन मंदिर में आचार्य गुणकीर्ति के हाथें खाण्डिलवाल वंशी श्रेष्ठी देहसुत बहुदेव ‘‘श्री देवालयः संप्रतिनव्य......’’ में भगवान शान्तिनाथ की प्रतिमा एंव भव्य तोरण की प्रतिस्थापना हुई। तोरण पर इस आशय का लेख उत्कीर्णित है।
       
        1140 - पृथ्वीराज चौहान के राज-कवि चन्द वरदाई रचित प्रसिद्ध डिंगल भाषीय ग्रन्थ ‘‘पृथ्वीराज रासो ’’ के छतीसवें समय के अनुसार उस समय चन्देरी पर शिशुपाल वंशी राजा पंचाईन राज्य करता था। वह रंणथंभ के राजा भान की सुंदर कन्या हंसावती पर मोहित हो गया था। दोनों राज्यों में घमासान युद्ध हुआ जिसमें गजनीपति सहाबुद्दीन गौरी ने चंदेरी पति का एंव सपादलक्ष (सॉंभर) पति पृथ्वीराज चौहान ने राजा घ्भान का साथ दिया। राज भान की विजय हुई। ‘‘रासो’’ के तेतालीसवें समय के अनुसार संवत् 1140 में गजनी का बादशाह पृथ्वीराज चौहान से लड.ने को फिर तत्पर हुआ। उसने ‘‘लाडनू’’ के किले को अपना मुकाम बनाया। चौहान सेना ‘‘खट्टू’’ (खाटू) से मुकाबिले के लिए आई। दो कोस पर दानपों फोजों में घमासान युद्ध हुआ। अन्ततः शहाबुद्दीन गौरी बंदी बना लिया गया।
       
        1190 - चन्देरी के प्रशासक राठौड राव के खरहत्थ के चार पुत्रों ने आक्रमणकारी यवनों का मुकाबला किया। पुत्र घायल हुये। जेनाचार्य जिनदत सूरी का चन्देरी पदार्पण हुआ। उनके सिद्धी मंत्र से पुत्रों को स्वास्थ्य लाभ हुआ। राव खरहत्थ और उसके पु़त्रों ने जैन धर्म अंगीकार किया। आचार्य ने उन्हें ओसवाल जाति में शामिल कर नए गोत्र निर्धारित किए। यथाः सावण सुखा, गोलेच्छा, पारख, गधैया , चौधरी आदि। यति रामलालजी के ग्रन्थ ‘‘महाजन वंष मुक्तावली’’ - 1910 में यति श्रीपालजी के ग्रन्थ ‘‘सम्प्रदाय शिक्षा’’ -1910 में उक्त कथन विस्तार से वर्णित है।
       
                - प्रशासक राव खरहत्थ के नाम पर गढ के इर्द - गिर्द फेले नगर एंव मूल बस्ती का नाम ‘‘खडत्या बास’’ हुआ। जोधपुर राज्य की बहियों में उन्नीसवीं शदी तक लाडनुं का ‘‘खडत्यावास’’ नाम से उल्लेख मिलता है। तीन सौ वर्ष के पूर्व तक के पट्टों (विक्रयनामों) में इस स्ािान के लिए ‘‘खडत्यावास ’’ नाम ही प्रयुक्त हुआ है। यह भी सम्भव है कि बस्ती ‘‘खडत्यावास’’ एंव गढ ‘‘लाडनूँ। नाम से चिन्हित है।
       
        1201 - वृहद दिगम्बर जैन मंदिर के भू- गर्भीय भग्नावेशो के एक खम्भे पर एत्कीर्णित प्रस्तर लेख में ‘महपतिपुर’ में आचार्य अनन्त कीर्ति द्वारा पादुका युगल प्रतिष्ठापन एंव देल्ह श्रेष्ठी के पौत्र और बहुदेव के पुत्र द्वारा स्मारक बनाने का उल्लेख है।
       
        1345 - श्रेष्ठि सुरजन गौधा द्वारा निर्मापित बिम्ब की भट्टारक प्रभाचन्द्र ने बडे जैन मंदिर में प्रतिष्ठा करवाई।
       
        1352 - जैन शान्तिनाथ मंदिर में गोठ (गोठी) गौत्रीय श्रेष्ठी सोम भार्या सालूणा देवी प्रदत ‘पार्श्वनाथ’ बिम्ब की प्रतिष्ठा हुई उसी समय देवेन्द्र सूरि के शिष्य धर्मदेव सूरि द्वारा लोढा गौत्रीय कालेस श्रेष्ठि द्वारा प्रदत ‘नेमिनाथ’ बिम्ब की प्रतिष्ठा भी हुई।
       
        1353 - सालूणा देवी सुतसागर पौत्र श्रेयस द्वार प्रदत ‘आदिनाथ’ बिम्ब की प्रतिष्ठ उक्त मंदिर में आचार्य धर्मदेव सूरि के कर-कमलों से हुई।
       
        1373 - खरतर गच्छ वृहद गुर्व्वावली में ‘लाडणू’ नगर का उल्लेख करते हुए गुणवान श्रावक साधारण द्वासरा वहॉं दक्षिण दिशा में एक बावडी (कुआ) बनवाने जिक्र है जिसकी प्रतिष्ठा स. 1373 में सम्पन्न हुई।
       
        1385 - लाडनूँ तोहिलवाटी क्षेत्र के ताम्बी गौत्रीय श्रीमाल ओसवाल श्रावक रत्नपाल के पुत्र जैन् आचार्य जिनप्रभ सूरि को दिल्ली के बादशाह मुहम्मद तुगलक ने स. 1385 में ‘‘सुरतान सराई’’ का विरूद दिया एंव जैन तीर्थों की रक्षार्थ फरमान निकाले। इन्ही आचार्य जिनप्रभ सूरि के एतिहासिक ग्रन्थ ‘‘विविध तीर्थ कल्प’’ की रचना स. 1385 में सम्पूर्ण हुई।
       
        - गढ के दरवाजे की दक्षिणी गोरखा दीवार पर इसी काल के अरबी भाषा में उत्कीर्ण शिलालेख में ‘‘लाडनूं’’ नाम अंकित है।
       
        1405 -शान्तिनाथ जैन मंदिर में उपलब्ध पीतल की परात पर अंकित वि. स. 1405 की दाता प्रशस्ति में लाडनूँ का उल्लेख किया है।
       
        1435 - हदीरा मस्जिद एंव अन्य अभिलेखों के अनुसार राव जयंसिह मोहिल द्वारा इस्लाम धर्म स्वीकार ।
       
        1434-40- पन्द्रहवी शताब्दी के शुरू में  लाडनूँ नाम जन साधारण में प्रचलित हो चुका था। ‘‘जाधपुर की ख्यात’’ (इतिहास) में राजपूत वीरम के लाडनूँ आने का उल्लेख है। मोहिलों के साथ (वि.स. 1434) वीरम का युद्ध हुआ  जिसकी गवाह युद्ध में खेत रहे खानपुर के समीप सांखला राजपूतों  वीरम की सांखला राणी के बंधु -बांधवों की खेत में खडी देवलियां हैं। वीरम वि.स. 1440 में मारा गया।
       
        1464-1466- नागौर के गरलेची मुसलमानों का लाडनॅू पर हमला। अमल पीकर धुत पडे सैंकडों मोहिल मारे गए। मुसलमानेां ने गढ में मस्जिद का निर्माण किया। दो वर्ष बाद मासेहिल आसराव ने फिर लाडनूॅ सर किया। गरलेचियों ने लाडनूॅ का पानी नहीं पीने की कसम उठाई। वे जब पूर्वजों की कब्रों पर कलमा पढने लाडनूॅं आते पानी के घडे साथ लाते हैैं। इस उपलक्ष में निर्मित गढ के प्रवेष द्वार पर बने छत्र पर ‘‘वि.स.1494’’ अंकित है।
       
        1495 - गरलेची मुसलमानों द्वारा जिस प्राचीन शान्तिनाथ मंदिर को नष्ट कर दिया गया था उसका पुनः निर्माण आचार्य जिनसागर सूरि की अध्यक्षता में हुआ। श्री जिनसागर सूरि द्वारा मूल नायक की प्रतिमा शान्तिनाथ मंदिर में प्रतिष्ठित हुई।
       
       1506 - शान्तिनाथ मंदिर में सुराणा गौत्रीय श्रेष्ठि सूमरा-नापासा के पुत्र खीमा ने धर्म घोष गच्छ के आचार्य पद्मानन्द सूरि के हाथों पिता पुण्यार्थ ‘मुनि सुव्रतजी’ के बिम्ब की प्रतिष्ठा कराई।
       
        1510 - शान्तिनाथ मंदिर में चंडालिया गौत्रीय श्रेष्ठि लाल साह कमल सीरि पूत्र जाहड केन भार्या सूह श्री दूखमि दे ने मलधारी गच्छ के आचार्य गुणसुंदर सूरि के हाथों ‘कुन्थुनाथ’ बिम्ब की प्रतिष्ठा कराई।
       
        16 वीं शताब्दी में उक्त शान्तिनाथ मंदिर मुस्लिम आततायीयों का फिर शिकार हुआ। परवर्ती 300 वर्षो तक यह खण्डहर बना रहा।
       
        1522 - मोहिल राणा अजरतमल की मोहिल वाटी पर राठौड राव जोधा की षुरू से घात थी। लाडनूॅ से दो कोस पष्चिम गणेड.ा गॉंव में दोनों योद्धाओं के बीच में हुई भीड.त में अतीत जूझते हुए मारा गया। साल भर बाद फिर जोधों ने युद्ध छेडा। मोहिलवाटी पर जोधों का कब्जा हुआ पर मोहिल तंग करते रहे। अन्ततः जोधाजी मंडोर चले गए और माहिल राणा मेघा षासक बना। मेघा की मृत्यु के बाद मोहिलवाटी 16 भागों में बॅंट गई। मोहिलों और जोधों के बीच झडपें होती रही।
       
        1532  - जोधाजी ने अपने दूसरे बेटे बीदोजी को मोहिलवाटी का पुशासक नियुक्त किया। मोहिल वैरसल दिल्ली के बादशाह बहलोत लोदी के हुक्म से हिसार के सूबेदार सांरग खॉं की फौज लेकर चढ आए। बीदोजी ने मजबूर हो द्रोणपुर खाली कर दिया। बीकाजी की सहायता से बीदोजी ने फिर एक बार मोहिलवाटी दखल कर ली। बैरसल मारा गया। सांरग खॉं हिसार भाग गया।
       
                - जोधाजी बीकाजी और बीदोजी ने मिलकर सारंग खॉं कों अन्तिम शिकस्त दी, सांरग खॉं मारा गया। इस खुशी में जोधाजी ने चतुराई से बीकाजी से ‘‘लाडनूँ’’ का परगना मांग लिया। भोजन पर बैठे जोधाजी का हठ देखकर बीदोजी की मॉं ने ‘‘लाडनूँ’’ थाल में परोस देने का आग्रह किया। तब से लाडनूँ जोंधपुर राज्य का अंग बना। मोहिलवाटी बीदायत (बीदासर ) नाम से मशहूर हुई। परन्तु मोहिल सरदार लाडनूँ के प्रशासक नियुक्त होते रहे।
       
        1540-50- लाडनूँ के प्रशासक मोहिल सरदार राव जयसिंह जोरावर बहादुर, धार्मिक और न्यायप्रिय थे। उन्होंने नगर विकासार्थ राव परकोटा, राव दरवाजा, राव कुंआ और राव तालाब का निर्माण करवाया।
       
        1544 - राव जयसिंह ने कवि सोमर पुत्र कवि जस्सूदान को 1500 बीघा जमीन खेती के लिए और 12 बीघा जमीन बसने के लिए प्रदान की। इस आशय का ताम्रपत्र अभी भी जस्सूदानजी के वंशजों के पास उपलब्ध है।
       
        - उन दिनों हिन्दुस्तान में मुगल सल्तनत बुलंदी पर थी। उन्हीं दिनों राजपूतों में डोला प्रथा का जन्म हुआ। एक देसरे को नीचा दिखाने एंव दिल्ली बादशाह से संबध बनाने के लिए नव वधू का डोला सर्वप्रथम बादशाह को भेट करने की होड. लगी। जोहिया राजपूत वधू का एक डोला लाडनूँ से गुजरा राव जयसिंह की बहादुरी से प्रभावित हो जोहियाणी उन्हें समर्पित हो गई, विवाह हुआ। परन्तु बादशाह कुपित हो गया। उसने लाडनूं पर हमला करने का हुक्म दिया। भंयकर लडाई हुई। अन्ततः रावच जयसिंह एंव जोहियाणी के इस्लाम धर्म स्वीकार करने पर छुटकारा हुआ। उनकी मृत्यु पर उन्हें हदीरा मस्ज्दि में उन्हें दफन किया गया।
       
        1589 - राव मालदेव राठौड. ने लाडनूँ मोहिलों से पूर्णतः हस्तगत किया।
       
        1616 - लाडनूँ नागौर के अन्तर्गत कालोता राजपूतों के अधीन रहा। जोगीदड.ा की छतरी इस बात का प्रमाण है।
       
        1689 - मुगल बादशाह शाहजंहा ने जोंधपुर महाराजा गजसिंह के बडे कुवंर अमरसिंह को नागौर के 555 गॉंवों का शासक बनाया। लाडनूँ उनके अन्तर्गत रहा।
       
        1699 - लाडनूँ केसरीसिंह जोधा को इनायत हुआ था। जोधपुर रेख बही के अनुसार वे पांच वर्ष लाडनूँ के शासक रहे। केसरीसिंह मतीरे की लडाई में मारे गए।
       
        1696 - केसरीसिंह की मृत्यु के बाद उनकी 5 पीढि.यों तक लाडनूँ। खालसे रहा। नागौर से सिंघी बंधु शासन करने आए। सिंघीजी का फलसा प्रशासन का केन्द्र बना। जोधा परिवार कसूम्बी जा बसा।
       
        1796 - सिंघीजी के कहने पर जोधुपर दरबार द्वारा ठाकुर केसरींसिह की 5वीं पीढी (केसरींसिह-चन्द्रभान-लखधीरसिंह-भरतसिंह-शिवदानसिंह) के ठाकुर शिवदान सिंह को लाडनूँ सहित सात गॉंवों का पट्टा इनायत हुआ।
       
विक्रम संवत् 1800 से 2000 तक
       
        1839 - ठाकुर शिवदान सिंह ने टालपुरियांे से युद्ध करने का बीड.ा उठाया। उमरकोट की लडाई में शिवदानजी लड.ते हुए काम आए। इस लड.ाई में अनेक अन्य योद्धा भी खेत रहे जिनमें ओसवाल मुत्सद्दी सिंघवी बनेचंद प्रमुख थे। युद्धोपरांत शिवदान सिंह जी के भाई पद्मसिंह जी को टीका किया गया। इस युद्ध की साक्षी लाडनूँ में राज दरवाजा के बाहर स्थित कलापूर्व छत्रियां हैं जिन पर इस आशय का प्रस्तर लेख उत्कीर्ण है। युद्ध के बाद लाडनूँ की कामदारी कोठारी श्रेष्ठियों को मिली। कोठारी राखेचा वस्तुमलजी के बडे लडके वीरभाणजी ने लाडनूँ ठिकाने का काम संभाला। उनके छोटे लडके नरसिंह दासजी ‘लेडी’ ठिकाने के कामदार नियुक्त हुए।
       
        1863 - जोधपुर महाराज विजयसिंह जी ने दीवान सिंघी इन्द्रराजजी को देश - निकाला दिया। वे कसूम्बी के जोधों के आश्रय में सुजानगढ की तलाई के समीप छिपे रहते थे। जब मीरखां ने जयपुर नरेश के ईशारे पर जोधपुर घेर लिया तो जोधपुर महाराजा को सिंघीजी की याद आई। उनके सात गुनाह माफ कर उन्हें बुलाया। सिंघीजी ने अपने बुद्धि - कौशल से मीरखां को धन देकर भगा दिया और स्वंय फौज ले जयपुर पर जा चढे। तब जोध्रपुर का घेरा उठा।
       
       1864 - लाडनूँ ठाकुर मंगलसिंह बडे बहादुर योद्धा थे। उनका 35 सेर वजनी भाला प्रसिद्ध था जिसे वे एक हाथ से फेंका करते थे। उन दिनो तारा चंदावत नाम डकैत ने मारवाड में उधम मचा रखी थी। ठाकुर ने चैलेंज स्वीकार किया। 2 कोस पर नाराण्या तालाब के पास मुठभेड हुई। ठाकुर का वजनी भाला पहले ही वार में तारा के दाहिने कंधे से शरीर को चीरते हुआ घोड.े के पेट से निकलकर जमीन से जा लगा।
       
        - ठाकुर मंगलसिंह के समय लाडनूं नगर का विस्तार हुआ। सीधी सपाट समानान्तर पट्टियां (गलियॉं) उसी समय की उपज हैं। पहली पट्टी में दड. के नीचे ‘चांद बाजार’ बना। पुराने पट्टों में इसका उल्लेख मिलता है।
       
        1865 - नवाब मुक्तार दौला द्वारा लाडनूँ एंव आस-पास के प्रदेश का घेराव हुआ। उसने पाबोलाव के पास पड.ाव किया हुआ था। करीब 1 लाख रूप्ये लेकर घेरा उठा।
       
        1901 - ठाकुर बहादुरसिंह लाडनूँ के शासक बने।
       
        1905 - शान्तिनाथ जैन मंदिर का पुनर्निर्माण लाडनूँ के बैंगानी घासीरामजी के प्रयत्न से श्रीसंघ प्रूमुख प्रतासिंह जी दूगड. के सौजन्य से सम्पन्न हुआ। मंदिर में इस आशय का एक प्रशस्ति लेख उत्कीर्णित है। कोठारी उपाश्रय के यति उभयदान जी ने सेवा प्रतिष्ठा प्राप्त की।
       
        1914 - सन 1857 के गदर के शमनोपरांत 5000 कालों (बागियों) की फौज लाडनूँ। से गुजरी। उन्होंने लोवड्यां, राव कुआ औ।र पीराजी के पास डेरा डाला। उस वक्त लाडनूँ के शासक ठाकुूर बहादुर सिंह थे। कोठारी उपाश्रय के पास लूँकडों का घर था। लुटेरे उसमें घुसने लगे। यतिजी ने उपाश्रय की छत से पत्थर बरसाए । फौजियों को गुस्सा आया। उन्होंने यतिजी को पकडकर टुकडे-टुकडे कर दिए। तीन दिन बाद फौज के चले जाने पर श्रावकों ने सेवगों के चौक में उनका दाह-संस्कार किया। फौज का कमाण्डर अब्दुल फजल था। उसने गढ पर हमला बोल दिया। बड.ी घमासान लड.ाई हुई। गौराउ ठाकुर भैंरूसिंह जी ने राउ दरवाजे का मोर्चा संभाला। गणेड.ा ठाकुर दुजैनसिंहजी बैदों की हवेली पर सुरक्षा संभालने आए। पर बैदों का कहना मानकर गढ पर गए। कोठारीजी की हवेली पर भी मोर्चा जमा हुआ था। कोठारी तनसुखदासजी इस युद्ध में काम आए। उनका स्मारक गढ के सामने चौक में आज भी विद्यमान है। नगर की भारी क्षति हुई। घर खाली हो गए। कालों की फौज ने खूब तबाही बरपाई। पुरोहितजी की हवेली का मोर्चा उनकी 18 वर्षीय पुत्री सुरजन ने संभाला। संवत 1911 में उसका विवाह हुआ। वह तलवार लेकर मर्दानों के भेष में कालों पर टूट पड.ी। घंटा भर के संघर्ष में अब्दुल फजल सुरजन के हाथों मारा गया। ठाकुर सुरजन सिंह ने सुरजन को पुरूष नाम से पुकारे जाने का अनमोल खिताब एंव अन्य बख्षीषे दी। वे स. 1958 में स्वर्गवासी हुईं। मांझी अब्दुल फजल की नर भक्षी तलवार कोठारी परिवार के पास लाडनूँ में सुरक्षित रही।
       
        1920 - जोधपुर नरेश तख्तसिंह के दीवान विजयसिंह मेहता ने संत मुनिपत जी को बिना दादा की आज्ञा के दीक्षा दे देने पर तेरापंथ श्वेताम्बर जैन धर्म संघ के पंचम आचार्य जयगणि की गिरफ्तारी का आदेश (वारंट) जारी कर दिया। जयाचार्य उस समय लाडनूँ विराज रहे थे। राज्य के घरुड.सवार वारंट लेकर जोधपुर से रवाना हुए। ज्यांेही समाचार लाडनूँ पहुँचा नगर में हलचह मच गई। दूलीचंदजी दुगड. की प्रार्थना पर जयाचार्य उनके मकान पर पधार गए। दूलीचंदजी तलवारबाजी में निपुण थे। उन्होंने पहरे पर अनेक कयामखानियों को नियुक्त किया और स्वंय नंगी तलवार लेकर डट गए। ‘‘ मेरे जीते जी मेरे गुरू को कोई हाथ नहीं लगा सकता’’ -प्रण किया। उधर जोधपुर में गुरू भक्त बादरमलजी भंडारी रात्रि में ही सीधे महल में पहुँचे । महाराजा ने सारी बात सुनकर गिरफ्तारी का आदेश रद्द कर नया आदेश जारी कर दिया। भंडारीजी के पुत्र किशनमलजी नया आदेश लेकर त्वरित गति से रवाना हुए। पहला गिरफ्तारी का आदेंश लाने वाले कारिदों को रास्ते में ही नया आदेश दिखाकर लौटा दिया। स्वंय लॉडनू आकर जयाचार्य के दर्शन किए। चारों ओर खुशी की लहर दौड गई। जयाचार्य ने भंडारीजी एंव दूलीचन्दजी की शासन सेवा की भूरि-भूरि प्रशंसा की।
       
        1930 - पिंडारी लूटेरा मीरखॉं ने पूरे राजस्थान में उद्यम मचा रखी थी। एक बार वह लाडनूँ आया। 500 घुडसवारेा ने लाडनूँ को घेर लिया। पीरांजी के दडे पर तोपखाना लगाया गया।लाडनूँ ठाकुर बहादुरसिंह जी नागौर से एक बड.ी तोप लाए थे। उसका तोपची काना था, पर था पक्का निशानेबाज। लब मीरखॉं की भयकाय तोप गढ की दीवार पर कहर बरपा रही थी तभी काने तापजी ने एसा निशाना साधा कि गोला मीरखॉं की भंयकाय तोप के मुँह पर गिरा। तोप फट गई। मीरखॉं डेरा उठाकर भाग गया।
       
        - ठाकुर पृथ्वीसिंह लाडनूँ के शासक बनें।
       
        - ठाकुर अणदसिंह लाडनूँ के शासक बने।
       
        1985 - श्रीमूलचंदजी सिंघी के प्रयत्न से ‘श्री रामानन्द गौशाला’ की स्थापना हुई।
       
        1989 - ठाकुर विजयसिंह लाडनूँ के शासक बने।
       
        - ठाकुर विजयसिंह की मृत्यु के बाद लेडी के ठाकुर सांवतसिंह को शासन कार्य सुपुर्द किया गया। उन्होंने मनमाने ढ.ग से खर्च किए।
       
        - राज्य सरकार द्वारा ठाकुर की अध्यक्षता में लाडनूँ नगरपालिका की स्थापना हुई।
       
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